जीवन के मोड़ पर ,सभी मामलों में (Subjects) है
कुदरत हमें हमेशा ' नामालिटी ' में ही रखती है हमें जब और जितनी जरूरत होती है हमारी उस
आवश्यकतानुसार होती है
पुण्याई के चेक भेजती रहती है ताकि हमारे जीवन में लक्ष्मी की तूट (कमी ) न हो तथा बहुत अधिक स्टॉक भी न हो
जन्म से मौत तक हमारी जरूरत के अनुसार सप्लाय (Supply) होती ही रहती है | अज्ञानता के कारण हम हमारी
पुण्याई की रकम का पूरा बैंक बैलेंस एक साथ ही रोकड़ करके खर्च कर देने की कोशिश करते है और फिर बाकी
की शेष ज़िन्दगी में लक्ष्मी की कमी महसूस करते है |
जब भी हमें जरूरत से ज्यादा लक्ष्मी मिलती है तब यह ध्यान में रहना चाहिए कि उतना हमारा ही बैंक बैलेंस कम
हो रहा है |
माता पिता की सेवा में स्वर्ण का सुख प्रात होता है | उनके आर्शीवाद से ससार के सभी सुख घर बैठे ही मिल जाते है
हमारे मन -वचन -काया दूसरों के लिए खचॅ करें तथा जगत के सभी जीव सुख -शांति प्रांत करें ऐसी भावना करने
से बहुत सुख मिलना है |
कुदरत का नियम है कि यदि आप दूसरों का ध्यान रखने है तो आपका सब कुछ कुदरत सभांल लेगी और यही
आप अपने ही स्वार्थ का विचार करते है तो कुदरत आपको आपके ऊपर अंहकार पर छोड़ देगी आपकी
जिम्मेदारी आप पर डाल देगी
यदि आप इन सभी भौतिक सुखों से ऊब गये है और जन्म -मरण राग -द्वेष व अज्ञानता से मुक्ति पाना चाहते
है तो ज्ञानीपुरुष की खोज करें उसकी आज्ञा को ही अपना धर्म व तप समझकर तन -मन- धन से अनन्य भाव
से उसकी सेवा करने से आपको इस ससार से "मृक्ति की लॉटरी " अवश्य लग जाएगी |
आँख खुलते ही जैसे पूरी रात्रि का सपने बीत जाता है वैसे ही ज्ञान होते ही अनन्त अवतार का सपने
(भव -भटकन रूपी ) समाप्त हो जाती है | बस इसके लिए सिफॅ अयाचक ज्ञानी को खोजेने की आवश्यकता
है अचानक महेमान आए तो भी भाव न बिगाड़े मन को कमजोर न होने दें और फिर ऐसी लॉटरी तो कभी -कभार
ही लगती है न ?
समझदार इंसान जीवन में एक ही नुकसान जो की फरजियात (Compulsory) है , वही उठाते है ,दूसरा नुकसान
नहीं होने देते !
यदि हम किसी के घर मेहमान बन कर गये हों और सामनेवाला मन बिगाड़कर खिलाए तो हमें कैसा लगेगा ?
अंत हमें दूसरों को मन बिगाड़कर नहीं खिलाना है यही मानवता का व्यवहार है मानवधर्म है
मानवधर्म का मतलब है "जो व्यवहार हमें अच्छा न लगता हो ऐसा व्यवहार हम दूसरों के साथ न करें"
मानवता से फिर से मनुष्य अवतार मिल सकता है मगर बाहर से "आइये पधारिये" और अंदर से ये मरे (बला) कहाँ
से आ टपके !" ऐसे भाव बिगाड़गे से विपरीत (उलटा ) होता है और विपरीत कर्म बंधन होता है |
माफ़ी मांगने से भूल सुधर सकती है और मन पर पड़े हुए दाग धूल जाते है
किसी भी सयोंग में मन को बिगड़ने न दें | रूपये बिगड़े (व्यथ खर्च हो ) तो चिंता की बात नहीं है दूसरे कमा लेंगे
कपड़े बिगड़े तो धो सकते है मगर मन तो ससार -सागर से पार उतरनेवाली नाव है उसमें छदे नहीं होने देने चाहिए
वरना ससार -सागर में हम डूब जाएँगे |
'नियमितता ' के सस्कार सिफॅ शिक्षक ही दे सकते है
जिनसे हमें शिक्षा प्राप्त करनी है उन्ही से झूठ कैसे बोला जा सकता है ?
हमारा भविष्य सफल हो , उसका शिक्षक बहुत ध्यान रखने है और सही मार्गदर्शन देते है इसलिए उसके साथ
व्यवहार में झूठ का प्रयोग कभी भी नहीं करना चाहिए | उनका मजाक से चिढ़ निकालने से नुकसार तो हमें ही
होता है वक्त पर 'स्कूल' जाना नियमित 'होमवर्क ' करना ये सब चीज़ें के लिए तो उपयोगी है ही इतना ही नहीं
नियमितता (Regularity) के सस्कार मिलने से जीवन भी सफल बनता है |
स्वय के हिताहित का भान (होश) ही खो दिया है इंसान ने ऐसे में यदि सबसे बड़ा कोई दुःख का कारण है
घर में सिफॅ तीन ही मानव हो फिर भी प्रकति इतना भिन्न होती है की शाम ढलते - ढलते तैतीस मतभेद खड़े
हो जाते है जिससे भीतर ही भीतर निंरतर क्लेश और व्याकुचता रहा करती है और फलस्वरूप कितने ही कर्म बध
जाते है |
इसे यदि समझ लें तो हमारे जीवन में से मतभेद और कलेश धीरे -धीरे निर्मूल होते जाते है और हमारा जीवन
सुखमय बन जाता है |
इस काल में यदि सबसे अच्छा कोई गुण है तो वह है कम बोलना इस काल में सबके शब्द पथर जैसे निकलते है
अंत बोलना कम कर दें तो अच्छा है |
हम न हों तो भी सब कुछ चलता रहे यह तो हमारा झूठा अंहकार है की हमारा उपस्थति से ही सब कुछ ठीक
ठाक चलता है
जिस दिन से बच्चों के साथ किच -किच करना (टोकना) बद केर देगें उस दिन से बच्चे सुधर जाएगें |
क्लेश करने से तो मौन रहना बेहतर है क्लेश -कलह से खुद का दिमाग ख़राब होता है और 'रिलेटिव'
(सापेक्ष ) सगाई है
हम किसी को सुधारने के लिए नहीं आए हम तो कर्म के चगुंल में से छूटते के लिए आए है फिर भी जीवन में कही
भी घबराने की जरूरत नहीं है
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