जैसी तृषा , उतनी प्राप्ति 



किसी से भी यदि पूछा जाए ,"आप जीवित है ? जिंदा है ?" तो कहेंगे , " हा , बेशक !"

अब अगर पूछा जाए , "आप जीवित है , उसका प्रमाण क्या है ?" तो तुरन्त कहेंगे ,हमारा ह्दय का धड़क रहा है 

श्वास -उच्चवास चल है | " तो तुरंत कहेंगे , "हमारा हदय का धड़कना या सांसो का चलना ,यही जिंदा -जीवित होने का 

प्रामण पयार्प्त है ? 'कोमा ' में जानेवाले इंसान (दर्दी ) की भी साँस चलती है , हदय धड़कना है इसीलिए तो डॉक्टर उसे 

मरा हुआ मृत जाहिर नहीं कर पाते | मगर फिर हम सभी जानते है की ऐसा इंसान जिंदा होते हुए भी मत्त्प्राय 

(Like a bead body) ही है क्योंकि उसकी तमाम सवेदनाए ,उसकी चेतनता , जगति लुप्त हो गए होती है इसलिए 

वह होश में  

होते हुए भी बेहोश है 

आज हम जिंदा तो है मगर 'होश' नहीं है भान नहीं है | हित - अहित (भले -बुरे )का भार ही नहीं है और ऐसी बेहोशी 

में ही पूरी ज़िन्दगी (यूँ तो अनन्त अवतार ) गुजर जाती है | हिताहित का भान , जागृति नहीं होने से यहाँ -वहाँ ,घर में 

माँ पिता के साथ बाहर पड़ोस में ,रिश्तेदारों के साथ ,सभी के साथ प्रतिषेण कही मन से कही काया से तो कही वाणी से

टकराव होना ,यानि मृत्यु को पाना !

कहने का तात्पे यह है की हम जीवित तो है मगर जागृत नहीं है जीवन में जागृति सम्मिलित हो तब सजीवन हो 

सकते है 

मन बीमार हो गया है जिसके फलश्वरूप तन और वाणी भी बीमार हो गये है तो दूसरी और हम या तो भूतकाल 

में जीते है या भविष्य की सोच में रहते है और इन दो  कल (बीते हुए और आनेवाले ) की विचारधाराओं के बीच 

हमारा आज हमारा वर्तमान को Present tense कहते है | Present यानि हाजिर रहना जब हम ज़िन्दगी के गुजरते 

हुए समय में हाजिर ही नहीं होंगे या जिस समय जहाँ होना चाहिए वहाँ नहीं होंगे तब ज़िंदगी को कैसे जी सकते है 

यही वजह है की आज हम जीवित होते हुए भी मृतप्राय ही है 

मगर इसका मतलब यह नहीं है की हमें भूतकाल के बारे में बात ही नहीं करनी चाहिए या भविष्य के बारे में 

सोचना बद कर देना चाहिए | हम जो कुछ करना या सोचना चाहें वें करें और सोचे भी मगर वर्तमान में रहकर 

अपनी वतमानता को जी वाले वत्ता को साबुत रखते हुए ! वर्तमान मध्यबिंदु (Centre) है | इस मध्यबिंदु के एक और 

भूतकाल है तो दूसरी और भविष्य काल है 

हम वर्तमान में क्यों नहीं रह पाते क्योकि बेचैन मन को समाधान नहीं मिल रहा है इस कलिकाल के जीव एक 

और स्वर के विचित्र कर्मो के बोझ से हैरान -पेरशान है तो दूसरी और उसके मन में उठनेवाले प्रश्न व दिधाओ 

के यथार्थ समाधान नहीं मिले पाते है